“Kuch kaha maine, kya tumne sunna…?”

Week: 01 Sep to 07 Sep

A verse by Javed Akhtar

A verse by Javed Akhtar

For this week, a collection of some poems in the language originally written in…the beauty of words sans cold translation

# A poem by Piyush Mishra~

ऐ उम्र !
कुछ कहा मैंनें,
पर शायद तूने सुना नहीं…
तू छीन सकती है बचपन मेरा,
पर बचपना नहीं

हर बात का कोई जवाब नहीं होता
हर इश्क का नाम खराब नहीं होता…
यूँ तो झूम लेते हैं नशे में पीने वाले
मगर हर नशे का नाम शराब नहीं होता…
खामोश चेहरे पर हज़ारों पहरे होते हैं
हँसती आखों में भी ज़ख़्म गहरे होते हैं
जिनसे अक्सर रूठ जाते हैं हम,
असल में उनसे ही रिश्ते गहरे होते हैं…
किसी ने खुदा से दुआ माँगी,
दुआ में अपनी मौत माँगी,
खुदा ने कहा, मौत तो तुझे दे दूँ मगर,
उसे क्या कहूँ जिसने तेरी ज़िंदगी की दुआ माँगी…
हर इन्सान का दिल बुरा नहीं होता
हर एक इन्सान बुरा नहीं होता
बुझ जाते हैं दीये कभी तेल की कमी से…
हर बार कुसूर हवा का नहीं होता !!!

# Two short verses by one of my favourite poets~ Harivanshrai Bachchan

*** दोस्ती…!
ना कभी इम्तिहान लेती है,
ना कभी इम्तिहान देती है ।
दोस्ती तो वो है –
जो बारिश में भीगे चेहरे पर भी,
आँसुओं को पहचान लेती है ।

आज रब से मुलाकात की,
थोड़ी सी आपके बारे में बात की,
मैंने कहा क्या दोस्त है,
क्या किस्मत पाई है!
रब ने कहा संभाल के रखना
मेरी पसंद है, जो तेरे हिस्से में आई है

दिन बीत जाते है सुहानी यादे बनकर,
बाते रह जाती है कहानी बनकर,
पर दोस्त तो हमेशा दिल के करीब रहेंगे,
कभी मुस्कान तो कभी आँखों का पानी बनकर….

*** आंसुओं को बहुत समझाया तनहाई मे आया करो,
महिफ़ल मे आकर मेरा मजाक ना बनाया करो !
आँसूं बोले . . .
इतने लोग के बीच भी आपको तनहा पाता हू,
बस इसलिए साथ निभाने चले आता हूँ !
जिन्दगी की दौड़ में,
तजुर्बा कच्चा ही रह गया…
हम सीख न पाये ‘फरेब’
और दिल बच्चा ही रह गया !
बचपन में जहां चाहा हंस लेते थे,
जहां चाहा रो लेते थे…
पर अब मुस्कान को तमीज़ चाहिए
और आंसुओ को तन्हाई !
हम भी मुस्कराते थे कभी बेपरवाह अन्दाज़ से…
देखा है आज खुद को कुछ पुरानी तस्वीरों में !
चलो मुस्कुराने की वजह ढुंढते हैं…
तुम हमें ढुंढो…
हम तुम्हे ढुंढते हैं.

# “Poora Din” (perhaps by Gulzar….)

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज़ मिलता है
मगर हर रोज़ कोई छीन लेता है,
झपट लेता है, अंटी से
कभी खीसे से गिर पड़ता है तो गिरने की
आहट भी नहीं होती,
खरे दिन को भी खोटा समझ के भूल जाता हूँ मैं
गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते हैं
“तेरी गुजरी हुई पुश्तों का कर्जा है, तुझे किश्तें चुकानी है ”
ज़बरदस्ती कोई गिरवी रख लेता है, ये कह कर
अभी 2-4 लम्हे खर्च करने के लिए रख ले,
बकाया उम्र के खाते में लिख देते हैं,
जब होगा, हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं
अपने लिए रख लूं,
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन
बस खर्च
करने की तमन्ना है !!

# And finally a verse by a contemporary and eminently quotable Javed Akhtar…

ज़िन्दगी के इस कश्मकश में
वैसे तो मैं भी काफ़ी बिजी हुँ…
लेकिन वक़्त का बहाना बना कर
अपनों को भूल जाना मुझे आज भी नहीं आता!

जहाँ यार याद न आए वो तन्हाई किस काम की
बिगड़े रिश्ते न बने तो खुदाई किस काम की
बेशक अपनी मंज़िल तक जाना है
पर जहाँ से अपने ना दिखे…
वो ऊंचाई किस काम की!

Advertisements

About sunsur81

A gatherer of thoughts...exploring myths,metaphors and expressions of life...
This entry was posted in Wizardry of Words and tagged . Bookmark the permalink.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s